ओम भैय्या के बारे

ओम भैय्या के बारे में अनुराग ‘हर्ष’ ने अपने ब्लॉग पर लिखा  है  –

अरे रामलाल बैठ जा। मुझे पता है यह रामलाल हमारे घनश्‍याम दास का बेटा है। पास वाले बोल रहे हैं कि श्‍याम लाल का बेटा है। इन्‍हें पता नहीं हमें पता है कि दुनिया की नजर में रामलाल श्‍याम लाल का बेटा है और असल में वो घनश्‍यामदास का बेटा है। …… अगले जो कवि आ रहे हैं उन्‍हें जरा ध्‍यान से सुनना, बहुत एंटीक चीज है, अस्‍सी पार है, अगली बार शायद ही दर्शन हो सके। बीकानेर के रेलवे स्‍टेडियम में करीब पांच वर्ष पहले ओम व्‍यास ओम ने इसी अंदाज में हजारों की भीड़ में अंगुली उठाकर अज्ञात को राम लाल बना दिया। लोग इतने हंसे की कविता से ज्‍यादा उनकी संचालन शैली और शब्‍दों पर लोटपोट हो गए। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी और वर्तमान में राजस्‍थान में पुलिस अधीक्षक आनन्‍द वदर्धन शुक्‍ला के निकटतम मित्र होने के कारण ओम व्‍यास ओम बीकानेर आए थे। तब भी उनकी मंचीय अदाकारी में मौत और मौत से तमाशा सबसे प्रिय विषय था। वो हर हाल में दर्शक को मंच से हंसाना जानते हैं। वो समझते है कि हजार दुखों पर एक हंसी का फव्‍वारा कितना कारगर होता है। दिल और दिमाग में जब दुनियादारी की फिजूल चिंता भारी हो जाती है तो हंसी ही उस तनाव को हवा कर सकती है। ओम व्‍यास ओम आज भोपाल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। निश्चित रूप से हजारों लोगों को खुशी का अहसास कराने वालों की दुआ उन्‍हें मौत के जंजाल से खींच कर फिर हमारे बीच लाएगी। ओमप्रकाश आदित्‍य, नीरज पुरी और लाडसिंह के निधन का हम सभी को दुख है। 

अनुराग ‘हर्ष’ के ब्लॉग का पता है : http://harshanurag.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html

पंकज सुबीर ओम भैय्या के बारे में निनाद गाथा पर लिखते है   – 

हिंदी के काव्‍य मंच की वाचिक परंपरा का वर्तमान का सबसे शालीन हास्‍य कवि चला गया । उनकी शालीनता और विनम्रता उनको विशिष्‍ट बनाती थी । सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया उन्‍होंने । हो सकेगा तो सीहोर के कवि सम्‍मेलन का वो वीडियो कभी लगाऊंगा जिसमें एक कवि को घटिया चुटकुला पढ़ने पर उन्‍होंने मंच संचालन करते हुए बीच में ही रोकते हुए बिठा दिया था । अब कोई उनसा नहीं होगा । भोपाल से ग्‍वालियर की यात्रा के दौरान उनसे हुई लम्‍बी बातचीत के कुछ संस्‍मरण हैं जिनमें उन्‍होंने अपने बारे में काफी कुछ बताया था । उन संस्‍मरणों में बहुत कुछ है जो उस हास्‍य कवि के पीछे के गंभीर इन्‍सान का परिचय देता है ।

निनाद गाथा का पता है : http://ninaaad.blogspot.com/2009/07/blog-post.html

दीपक असीम ने वेब दुनिया पर लिखा है –

…वे ऐसी हास्यास्पद स्थितियों का वर्णन करते थे और अपनी टिप्पणियों के साथ उन वर्णनों को और मज़ेदार बना देते थे। यही मज़ेदार बातें उनकी कविताएँ होती थीं। कविता की जितनी भी परिभाषाएँ की गई हैं, उनमें से एक में रसपूर्ण बातों को भी कविता कहा गया है।

वेब दुनिया का पता है : http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/remembrance/0907/09/1090709062_1.htm

रवींद्र व्यास ने वेब दुनिया पर लिखा है –

ब्लॉग जगत पर कुछ ब्लॉगों ने उन्हें अपने तरीके से याद किया है। मिसाल के तौर पर कल्पतरू ब्लॉग पर विवेक रस्तोगी लिखते हैं कि अब ओम भय्या फ्रीगंज (उज्जैन) की मामा की पान की दुकान पर नहीं मिलेंगे और न ही अपने सफेद स्कूटर पर ऑफिस जाते हुए दिखेंगे। यह बहुत बड़ी क्षति है।

जबकि कबाड़खाना ब्लॉग पर संजय पटेल लिखते हैं कि वे मालवा के ह्रदय-स्थल उज्जैन के बाशिंदे थे और मालवी हास्य कविता के पितामह भावसार ‘बा’ को अपना प्रेरणास्त्रोत मानते थे। ओम व्यास ने यदि सुरेन्द्र शर्मा,अशोक चक्रधर,माणिक वर्मा,स्व.ओमप्रकाश आदित्य,अरूण जैमिनी,शैलेष लोढ़ा,कुमार विश्वास,हुल्लड मुरादाबादी के साथ अपनी राष्ट्रीय पहचान बना ली थी तो उसकी एक वजह यह थी कि वे जनपदीय कवि की हीनता के बोध से उबर आए थे और अपनी कहन, परिवेश और शब्द कौशल पर भरोसा रखते थे।

ये जानते हुए कि मालवी परिवेश और जन-जीवन को केन्द्र में रख कर लिखी गई रचनाएँ है। उसे देश ही नहीं विदेशी श्रोताओं के सम्मुख भी उन्हीं के कलेवर में परोसने का सलीक़ा सीख गए थे। हास्य उनकी काव्य यात्रा का स्थायी भाव था और ठहाकेदार कविताएँ उनके लिये रोज़ी-रोटी का जुगाड़ भी करती थी। लेकिन माँ और पिता शीर्षक की उनकी ताकतवर कविताओं की लोकप्रियता का प्रमाण यही है कि न जाने कौन कौन अपने नाम से इन कविताओं को मंच पर सुनाकर और पत्र-पत्रिकाओं में छाप कर वाहवाही लूट रहा है।

जाहिर है यह टिप्पणी बताती है कि उनके जाने से मालवी कविता को कितना नुकसान हुआ है। यह टिप्पणी यह भी बताती है कि अपनी हास्य कविताओं के लिए जाने जाने वाले इस कवि के पास कितनी मार्मिक कविताएँ हैं। वे शायद बेहतर कविताएँ लिख रहे थे। राजेश चेतन ने अपने ब्लॉग चेतन चौपाल पर ओमजी के कुछ फोटोज लगाए हैं। ये फोटो इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे इस हास्य कवि के व्यक्तित्व की एक आत्मीय झलक मिलती है।

इन फोटोज में वे कहीं समुद्र के किनारे ठेठ अपनी खाँटी अदा में खड़े हैं तो कहीं किसी मित्र के साथ पीछे छिपते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं। एक फोटो में तो वे अपनी लंबी चोटी को खड़ा किए हुए नजर आते हैं। जाहिर है इन फोटो से उनकी सहजता सरलता अभिव्यक्त हो रही है।

कितनी छोटी छोटी जगहों पर ओम जी के प्रेमी लोग थे। उनके कई ऐसे किस्से हैं कि उज्जैन, इंदौर, रतलाम के वे जब जिस शहर में जाते वहाँ के रेलवे स्टेशन पर भीड़ लग जाती थी और कुछ लोग उनके लिए पानी की बोटल ले आते थे तो कुछ लोग नाश्ता। कई लोगों को तो उनका पूरा नाम तक नहीं पता था और उन्हें सिर्फ पंडितजी के नाम से ही जानते थे। इस तरह के मिलनसार, अनूठे, सहज कवि के जाने से सचमुच हास्य मंच अब सूना हो जाएगा।

वेब दुनिया का पता है :  http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0907/10/1090710027_1.htm

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