बेटा

 यूँ तो बहुत सताता बेटा,
याद बहुत पर आता बेटा,
अर्थ का अर्थ बदल देता जब,
तुतलाकर वो गाता बेटा |
गलती खुद की खुद रोता भी,
भैय्या नाम बताता बेटा |
पापा के हाथों में टॉफी,
लाड़ बहुत जतलाता  बेटा,
आधा ऊपर आधा मुंह में,
खाने को जब खाता बेटा,
पैंया पैंया  पापा देखी,
कितनी खुशियाँ पाता बेटा,
सर्दी, खांसी या बुखार में,
सोकर ना सो पता बेटा,
मम्मी जागी पापा भागे,
चिंताएं दे जाता बेटा |
 
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8 Responses

  1. छोटे बच्चे का मनोविज्ञान बहुत खूबसूरती से लिखा है

  2. सादर वन्दे!
    मै ओम जी बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, आज ब्लोग पर पा कर अपने ख़ुशी का इजहार नहीं कर पा रहा हूँ |
    आपकी “माँ- बाप” के ऊपर लिखी गयी कविता मेरे लिए अनमोल है, जब भी माँ (माँ से दूर रहकर पढाई करता हूँ) की याद आती है मै आपकी कविता सुन लेता हूँ |
    इस रचना के लिए आपको कोटि -कोटि नमन |
    रत्नेश त्रिपाठी

  3. बहुत अच्छा लगा पढ़कर,

  4. क्षमा करें! मुझे उनके ना होने की जानकारी नहीं थी | लेकिन फिर भी वह हमारे बीच में ही हैं, मै जब भी उनकी रचनाये सुनता हूँ वो सामने ही तो होते हैं!
    रत्नेश

  5. Mai to ek samany shrota rha pr Aaj bhi om vyasji ko yad kr aakhe bhar aati hai. kvita pr tippani karne ke bajay aapka dil pidit kiya maf karna.

  6. Sundar Baal Kavita…
    Maa-baap kitna khyal rakhte hain chhote bachhe ka bakhubi prastut kiya hai aapne…
    bahut shubhkamnayne

  7. अच्छी रचना.

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