बेटा

 यूँ तो बहुत सताता बेटा,
याद बहुत पर आता बेटा,
अर्थ का अर्थ बदल देता जब,
तुतलाकर वो गाता बेटा |
गलती खुद की खुद रोता भी,
भैय्या नाम बताता बेटा |
पापा के हाथों में टॉफी,
लाड़ बहुत जतलाता  बेटा,
आधा ऊपर आधा मुंह में,
खाने को जब खाता बेटा,
पैंया पैंया  पापा देखी,
कितनी खुशियाँ पाता बेटा,
सर्दी, खांसी या बुखार में,
सोकर ना सो पता बेटा,
मम्मी जागी पापा भागे,
चिंताएं दे जाता बेटा |
 

यहाँ मिले सभी हँसाने वाले…

जितने आंसू पोंछे  जग के,
उतने आंसू मैं रोया हूँ
हंसा हंसा कर, खून जलाया
और बना मैं वो **”खोया” हूँ
यहाँ मिले सभी हँसाने वाले
रुके, हँसे और चले गये
सबको नींद सलोनी आई
जाग – जागकर मैं सोया हूँ !!

** खोया=मावा (Condensed milk )

माँ पर एक और कविता…

दुनिया संचालित करने वाले संचालक !
प्रश्न करता है – मेरा मन
छोटे बच्चे कि कोमलता पर
तूने – बहुत रहम खा कर
दे दी एक ‘माँ’ कि गोद / ‘माँ’ का दूध / ‘माँ’ का स्पर्श
ये तेरा सुकोमल व्यक्तित्व,
उस दिन निष्ठुर और क्रूर
क्यों हो जाता है ?
जब एक ही झटके में
छीन लेता है – तू
अबोध बच्चे से .. ‘माँ’ का स्तन / ‘माँ’ का स्पर्श
होकर बड़ा सोचता होगा ? वह अबोध
और करता होगा मलाल, 
जिसके कारण सब कुछ देख रहा है,
उसे नहीं देख पाया ..
जिसे सब ‘माँ’ कहते है |

इनडोर प्लांट

 

मेरे घर की बैठक में रखे है – कई गमले

लगे कई

इनडोर प्लांट्स

जिनमे फूल नहीं खिलते, फल भी नहीं आते

और खुशबू भे नहीं दे पाते हैं –

बेचारे

पर – फिर भी वे सब प्यारे हैं मुझे

 

जिंदगी के मकान में,

दिल की बैठक में

मैंने भी लगा रखा है – एक गमला

लगाया है ‘स्नेह’ का एक इनडोर प्लांट

यह जानते हुए भी कि, वह

फल, फूल नहीं देता

पर प्रेम की खुशबू का स्वाद मुझे जिजीविषा देता है

और… मैं ! तुम्हारी प्रतीक्षा में

स्नेह सहित … सींचता हूँ

सपनों कि बगिया को…

रविवार

अब नहीं रहा वैसा,
न गलियों में गेंद के पीछे भागते बच्चे / खेलते गुल्ली डंडा
फैलाती भी नहीं  सिगड़ी ख़ुशी का धुआं
नहीं आती जाती बंद तश्तरियां / इस घर से उस घर
शाम नहीं ठहरती बगीचों में / रविवार का सब कुछ बदल गया है
सर सुबह का
धड दोपहर का
पैर सांझ के
हंसी कैद, चार दीवारों में बच्चों की / सिगड़ी से उठता कसैला धुआं
मुठ्ठी में बंद गयी है शाम और /रात निगल जाते है रेस्तरां
बनावटी मुस्कान लुटते
सड़कों को रौंद रहे है लोग /नहीं करते इंतज़ार उसका
जेब की ताकत / और
फुटपाथ से दूर हो गया रविवार
लगता है
अट्टालिकाओं ने रेहान रख लिया है
रविवार…

शुरुआत के दिनों में ओम भैय्या की लिखी हुई एक कविता, तब शायद ओम भैय्या व्यंग्य नहीं लिखते थे.

पिता

पिता…पिता जीवन है, सम्बल है, शक्ति है,
पिता…पिता सृष्टी मे निर्माण की अभिव्यक्ती है,
पिता अँगुली पकडे बच्चे का सहारा है,
पिता कभी कुछ खट्टा कभी खारा है,
पिता…पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है,
पिता…पिता धौंस से चलना वाला प्रेम का प्रशासन है,
पिता…पिता रोटी है, कपडा है, मकान है,
पिता…पिता छोटे से परिंदे का बडा आसमान है,
पिता…पिता अप्रदर्शित-अनंत प्यार है,
पिता है तो बच्चों को इंतज़ार है,
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं,
** पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं,
पिता से परिवार में प्रतिपल राग है,
पिता से ही माँ की बिंदी और सुहाग है,
पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ती है,
पिता गृहस्थ आश्रम में उच्च स्थिती की भक्ती है,
पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार की पूर्ती है,
पिता…पिता रक्त निगले हुए संस्कारों की मूर्ती है,
पिता…पिता एक जीवन को जीवन का दान है,
पिता…पिता दुनिया दिखाने का एहसान है,
पिता…पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है,
तो पिता से बडा तुम अपना नाम करो,
पिता का अपमान नहीं उनपर अभिमान करो,
क्योंकि माँ-बाप की कमी को कोई बाँट नहीं सकता,
और ईश्वर भी इनके आशिषों को काट नहीं सकता,
विश्व में किसी भी देवता का स्थान दूजा है,
माँ-बाप की सेवा ही सबसे बडी पूजा है,
विश्व में किसी भी तिर्थ की यात्रा व्यर्थ हैं,
यदि बेटे के होते माँ-बाप असमर्थ हैं,
वो खुशनसीब हैं माँ-बाप जिनके साथ होते हैं,
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं
क्योंकि माँ-बाप के आशिषों के हाथ हज़ारों हाथ होते हैं

** यह लाइन मुझे हिला कर रख देती है.. हर बार भोलू का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम जाता है

पापा हार गए…

पापा हार गए…

रात-ठण्ड की
बिस्तर पर
पड़ी रजाईयों को अखाडा बनाता
मेरा छोटा बेटा पांच बरस का |
अक्सर कहता है –
पापा ! ढिशुम-ढिशुम  खेले ?
और उसकी नन्ही मुठ्ठियों के वार से मै गिर पड़ता हूँ … धडाम
वह खिलखिला कर खुश हो कर कहता है .. ओ पापा हार गए |
तब मुझे
बेटे से हारने का सुख महसूस होता है |
आज, मेरा वो बेटा जवान हो कर ,
ऑफिस से लौटता है, फिर
बहू की शिकायत पर, मुझे फटकारता है
मुझ पर खीजता है,
तब मै विवश हो कर मौन हो जाता हूँ
अब मै बेटे से हारने का सुख नहीं,
जीवन से हारने का दुःख अनुभूत करता हूँ
सच तो ये है कि
मै हर एक झिडकी पर तिल तिल मरता हूँ |
बेटा फिर भी जीत जाता है,
समय अपना गीत गता है …
..मुन्ना बड़ा प्यारा, आँखों का दुलारा
कोई कहे चाँद कोई आँखों का तारा

काव्य संग्रह सुनो नहीं तो पढो से