पुस्तके माध्यमिक विद्यालय

पुस्तके माध्यमिक विद्यालय! यही नाम था जिस स्कूल में हम चारो भाई बहनों की प्रारंभिक शिक्षा हुयी थी | उस समय यह स्कूल ‘व्यायाम शाला, भागासी पूरा ‘ के नाम से ज्यादा जाना जाता था | स्कूल के दिनों की स्मृतियाँ सब से खुशनुमा है | बड़ा अच्छा और खुशनुमा माहौल था | खेल कूद और ढेर सारी सांस्कृतिक गतिविधियाँ हुआ करती थी उन दिनों, और हम चारो भाई उसमे हिस्सा लेते रहते थे, पर बस डर रहता था अन्ना सर का | अन्ना सर उस स्कूल के संस्थापक थे, एक दम सीधा सादे पर बेहद कड़क अनुसाशन वाले | रोज सुबह पूरे स्कूल की सफाई अपने हाथो से करते थे, मुझे नहीं लगता ऐसा जस्बा मैंने कही और देखा हो ?

स्कूल के सामने एक छोटा सा ग्राउंड था जहाँ हमारी  सुबह की प्रार्थना होती थे, उसी ग्राउंड के दोनों तरफ दर्शको के बैठने के लिए सीढ़ियों जैसी व्यवस्था थी, वैसी ही जैसी किसी स्टेडियम में दर्शक दीर्घा होती है, उन्ही सीढ़ियों के बीच बीच में लोहे के खम्बे लगे थे जो लगातार हाथ लग लग कर एक दम चिकने हो चुके थे, हम लोग अक्सर अन्ना सर की नजर बचा कर उन खम्बो को पकड़ कर फिसला करते थे, और किसी दिन अगर पकडे गए तो अन्ना सर के व्यायाम कर कर हुए कड़क हाथों के झन्नाटे दार चांटे प्रसाद के रूप में प्राप्त होते थे. | चांटे खा कर लगता था की वो दुनिया के सबसे बड़े खलनायक है, पर आज जब सोचता हूँ तो की वो समर्पण और बच्चों के लिए सुरक्षा का भाव शायद आज की व्यावसायिक शिक्षा प्रणाली में कहीं नहीं नहीं पाया जाता होगा | 

उज्जैन

खैर, चौथी  क्लास तक आते आते, पिता जी का ट्रान्सफर फिर  उज्जैन हो गया और सन १९७४ में हम लोग भिलाई से उज्जैन आ गए |मुझे अभी भी याद है वो यात्रा जिस में सिर्फ हम बच्चे थे और साथ में थी हमारी मां.. तब भी उसका साहस अतुलनीय था और आज भी उसके साहस के बदौलत ही हम सब जिन्दा है|

उज्जैन शुरू शुरू में हमें ऐसा लगा जैसे हम लोगो किसी गाँव में आ गए | कहाँ भिलाई की वो सुव्यवस्थित सेक्टर्स में विभाजित  कॉलोनियां और कहाँ गली कूचों से भरा उज्जैन शहर ? पर धीरे धीरे राम गए और उज्जैन प्यारा लगने लगा | उस समय भी शहर दो हिस्सों में विभाजित था, पुल के उस पर नया शहर जो फ्री गंज (माधव नगर)  कहलाता है और पुल के इधर पुराना शहर. हम लोग पहले फ्री गंज में एक किराये के मकान में रहने लगे| उन दिनों पब्लिक स्कूल का प्रचलन नहीं था पर उस समय के दो एक को-एड स्कूल्स में एक, जो व्यायामशाला कहलाता था, हम लोगों का दाखिला हो गया | फ्री गंज में रह कर पुराने शहर में पढाई करने आना कोई समस्या नहीं रही क्यूंकि उन दिनों सिटी बस चला करती थी, सब भाई बहनों के पास बन गए | रोज स्कूल जाना भी एक सुखद एहसास था | हम लोगों के रोज आने और जाने की समस्या (?) माता पिता को रास नहीं आई और हम लोगों पुराने शहर में गुदरी चौराहे पर, स्कूल के नजदीक एक मकान में स्थानांतरित हो गए | स्कूल अब बस १ मिनिट की दूरी पर ही था |