भिलाई

पिताजी स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में अधिकारी थे, इसलिए अक्सर ही उनका तबादला होता रहता था. इसी तारतम्य में वो उज्जैन से डोंगरगढ़ पहुंचे . उन दिनों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ एक ही प्रान्त हुआ करता था.  हम दोनों भाइयों की पैदाइश डोंगरगढ़ में हुई  थी | मै ओम भैय्या से लगभग २ साल छोटा था (‘था’ इसलिए कि, अब वो मुझे बड़ा बना कर चले गए है).. खैर डोंगरगढ़ का तो कुछ याद नहीं पर भिलाई में गुजरे दिन अच्छी तरह से याद है. भिलाई अपने स्टील प्लांट कि वजह से मशहूर है. पूरा शहर सेक्टर्स में बटा हुआ है. हमें सेक्टर ६ में बैंक कालोनी में क्वार्टर मिला. और धीरे धीरे हम बच्चो कि एक मण्डली जम गयी.

भिलाई के वो दिन मस्ती भरे, बेफिक्र दिन मानो आँखों के आगे चलचित्र की तरह घूम जाते है | भिलाई स्टील प्लांट के स्कूल में हम सभी भाई बहनों की प्रारंभिक शिक्षा हुई | प्रथम गुरु के रूप में हमारे चचेरे भाई ‘जगदीश भाई साहब’ की स्मृतियाँ आज तक ताजा है| घर पर एक सोनी सर पढ़ने आया करते थे, ओम भैय्या और सभी भाई बहनों की सुन्दर हस्तलिपि का पूरा श्रेय सोनी सर को जाता है, जो रोज हमें होम वर्क के साथ एक पृष्ठ हिंदी में लिखने के लिए दे जाते थे| किसी भी दिन अगर आप ने वो एक पेज नहीं लिखा तो पेंसिल उँगलियों के बीच डाल कर जो दर्द देते थे वो आज भी महसूस होता है| पर आज महसूस होता है की जो कुछ उन्होंने हम लोगो की हस्तलिपि सुधरने के लिए किया वो वैसा प्रयास शायद आज कल के गुरुजन नहीं करते होंगे.   

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